Friday, July 10, 2020

वक़्त

Photo by Gif Frame on Unsplash

एक वक़्त था
जब इंतज़ार रहता था
डाक के आते ही
अपने ख़ज़ाने को बटोर लेने का

वक़्त था वह
जब वे हसीन लव्ज़
दिल में बस जाते थे
ख़ामोशी से बार बार
पढ़े जाते थे
उपहार में वो खत
मुस्कराहटें दे जाते थे

उस वक़्त का ज़ायका
अब भी ज़हन में है कहीं
उन पन्नों की खुशबुएँ
महसूस हैं अभी भी कहीं

न जाने फिर
कैसे वह वक़्त बदला
वो कागज़ मुर्झा से गए
सन्नाटे की खाई में
सारे अलफ़ाज़ खो गए

दिल की आवाज़ पर
ताला पड़ गया
भर्राये गले से
नग्मा छिन गया

वक़्त और गुज़रा
जुड़ते गए कई वाक़ियात
कई ने फिर किया आघात
ढूँढते रह गए वजाहात

वक़्त ठहर सा गया फिर
नज़रें आप से मिलाई जब
बगिया खिल उठी फिर
नज़्मों को गले लगाया जब

खुद से खुल कर
बातें जब की हमने
मन का मलाल मिटने लगा
नए साहस ने साथ निभाया
अब भर्राए गले के बावजूद
नग्मे गुनगुनाते हैं
और किसी से ना सही
खुद से खूब बतियाते हैं

वक़्त फिर बदल रहा है शायद

- July 8,2020

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